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Saturday, May 8, 2010

ताज़िराते हिंद... दफ़ा ३०२ के तहत...

२६/११ के हमले का मुख्य आरोपी अज़मल आमीर क़साब को कोर्ट ने फांसी की सज़ा सुनाई। इस आतंकवादी का आतंक डेढ़ साल पहले पूरे विश्व ने लाईव देखा था। फिर भी उसे सिर्फ़ सज़ा सुनाने मे भारतीय न्यायव्यवस्था को डेढ़ साल से भी ज़्यादा वक्त लगा। जब क़साब को सज़ा सुनाई गयी, तब मुंबई और भारत मे कई जगह बड़ी धूम-धाम से खुशियां मनाई गयी। कुछ लोगो ने मिठाईयां बांटी, कई ने पटाकें जला के अपनी खुशियां ज़ाहिर की। जिस पाकिस्तानी आतंकवादी का आतंक पूरे विश्व ने देखा था, उसे फांसी की सज़ा की अपेक्षित थी। क़साब को फ़ाईव स्टार होटल के माहोल मे रखने के बाद फांसी की सज़ा सुनाई गयी, इस मे इतनी खुशियां मनाने की ज़रूरत नहीं थी। गांधी के इस देश मे किसी को फांसी की सज़ा सुनाने के बाद इतनी खुशियां मनाते मैंने पहली बार देखा है।

अब फांसी तो सुनाई, मगर उस का अमल करना हमारे देश के लिए तकरिबन नामुमकिन काम बन गया है। अपनी न्यायप्रक्रिया से भारत के सभी नागरिक वाक़िफ़ है। इस के बाद क़साब के सामने हाय कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट का रास्ता खुला है। अगर उसने यहां अपील की तो और भी वक्त ज़ाया हो सकता है। और सबसे बड़ी बात यह तो है के सन २००४ से इस देश मे कोई फांसी नहीं दी गयी। फांसी से बचने का एक बडा़ मार्ग हमारी राज्यघटना ने हमे दिया है। वो है, राष्ट्रपति से अपील। जिन जिन लोगों को पिछले सात सालों मे फांसी की सज़ा सुनाई गयी है, उन सब ने राष्ट्रपति से सज़ा कम करने के लिए अपील की है। यह आंकडा ३० से भी अधिक है। इस में अपनी संसद पर हमला करने वाला आतंकवादी अफ़ज़ल गुरू भी शामिल है। केंद्र सरकार इस आतंकवादी की फांसी को अब तक टालते आई है। इस के पीछे क्या कारण है, यह आम जनता तो नहीं जानती। कुछ साल बाद इस कतार मे अज़मल आमीर क़साब का नाम भी शामिल हो जायेगा। तब तक कई साल गुज़र गये होंगे। अपने राष्ट्रपति अपने काम बहुत ज़्यादा बिज़ी होने के कारण उन्हे फांसी की याचनाओं को देखने के लिए बिलकुल वक्त नहीं मिल रहा। अगर अगले २० साल तक किसी भी राष्ट्रपति को वक्त नहीं मिला तो यह देश फांसी से मुक्तता पा सकता है। और गुरू तथा क़साब जैसे आतंकी खुले आम देश की जनता का क़त्ल करते घूमेंगे। क्योंकी उन्हे कभी भी अपनी मौत का भय नही होगा। पिछले कई आतंकी घटनाओं से अब हम सब जान चुके है की, आतंकवादियों को हमारी न्यायव्यवस्था कुछ भी नहीं कर सकती...!
क़साब को फांसी की सज़ा सिर्फ़ ’सुनाकर’ हमने कोई बड़ा तीर नहीं मारा है। इससे आतंकियों को कुछ सबक़ नहीं मिला है। अगर अगले पूरे सालभर मे उन्होने क़साब को फांसी पर चढाया तोही समझ मे आयेगा की हमारी न्यायव्यवस्था मे कुछ तो दम है। नहीं तो पाकिस्तानी आतंकी और जोरशोर से भारत पर हमले की तैयारी करने लगेंगे।

Tuesday, April 27, 2010

ऑटोग्राफकी यादें

ऑटोग्राफ बूक के बारे में तो हम सभी ही जानते है। स्कूल के या कॉलेज के दिनों में कई युवाओं के लिए इस की अलग अहमियत होती है। इसी ऑटोग्राफ बूक को लेकर तमिल में ’ऑटोग्राफ’ नाम की फ़िल्म बनी गयी। यह फ़िल्म सन २००४ में रीलीज़ हुई थी।

यह फ़िल्म सबकुछ चरण है। यानी इस फ़िल्म के निर्देशक, निर्माता, लेखक तथा मुख्य कलाकार चरण है। शायद इसी लिए जो प्रभाव दर्शकों पर पडने की उम्मीद इस फ़िल्म से की जा सकती है वह प्रभाव दिखाई देता है। इस हफ़्ते कई दिनो बाद नई तमिल फ़िल्म देखी। इस से पहले ’शिवाजी द बॉस’ देखी थी। ’ऑटोग्राफ’ की कहानी एक कॉलेज युवा जिस का नाम सेंथिल है, उस के ऑटोग्राफ बूक पर आधारित है। गांव में शिक्षा होने के पश्चात जब वह शादी का कार्ड बाटने अपने गांव आपस आता है, तब ऑटोग्राफ बूक की उस की वह यादें फिर से नयी हो जाती है। अपने किशोर तथा युवक अवस्था में किए प्यार की यादें उसे ताज़ा करती है। ज़िंदगी का पहला प्यार उसने अपने स्कूल की एक लड़की से किया था। उस के बालों की यादें अभी तक उस के साथ थी। लेकिन आज उस की शादी हो गयी थी और वह तीन बच्चों की मां भी है। उसे मिलने के बाद वह खुश होता है।
गांव छोडने के बाद युवावस्था का प्यार जिस का नाम लतिका है उस से हुआ था। वह एक मल्याली लडकी थी। दोनों को एक दूसरे की ज़बान नहीं समजती थी मगर भावनाओं की भाषा उन्होने अच्छी तरह से समझ ली थी। लतिका से मिलने वह केरल चला जाता है। शायद उसे लगा होगा की अब लतिका अपने जीवन से खुश है। मगर असल में वह आज एक विधवा का जीवन बिता रही है। लतिका से उस का मिलना और अंत में बिछडना एक फिल्मी कहानी की याद दिलाता है।
आखिर में उस के जीवन में तिसरी लडकी का प्रवेश होता है। वह उस की प्रेमिका नहीं मगर एक मार्गदर्शक है। लतिका से बिछडने के बाद स्नेहा ही उसे जीवन का सही रास्ता दिखाती है। और संथिल की शादी अंत में कनिका से तय होती है। उन की शादी में उस की तीनों सहेलियां शामिल होती है।
क्या सोचा था और कहां आ गये? इस प्रकार की कहानी ’ऑटोग्राफ’ में नज़र आती है। शायद यही फ़िल्म की कहानी का आत्मा है। चरण की कहानी आज के कई युवाओं से मिलतीजुलती लगती है।
इस फ़िल्म को सन २००५ के राष्ट्रीय पुरस्कारों में चार पुरस्कार मिले थे, जिस में ’परिपूर्ण मनोरंजन फ़िल्म’ का एवार्ड भी शामिल था। २००४ साल की यह तीसरी सबसे बडी हिट फ़िल्म थी।

Sunday, March 28, 2010

यह है अपनी शिक्षा...


दैनिक नवभारत टाईम्स पढ़ते समय मेरी नज़र एक ख़बर पर रूक गयी...

भुवनेश्वर।। उड़ीसा के विकास मोहराना की कहानी सरकारी स्कूलों में हो रही पढ़ाई की पोल खोलने के लिए काफी है। वह पांचवीं में पढ़ता है, पर उसे अपना नाम लिखने नहीं आता। अपने पिता के मर्डर केस के मामले में कोर्ट के सामने पेश हुआ यह बालक जब अपना नाम नहीं लिख पाया, तो कोर्ट को ताज्जुब हुआ। कोर्ट ने स्कूल को समन जारी कर पूछा है कि आखिर यह बालक पांचवीं क्लास तक कैसे पहुंच गया, जबकि वह नाम भी लिख पा रहा है।
10 साल का विकास मोहराना अपने पिता के मर्डर में केस के गवाह के रूप में कोर्ट के सामने पेश हुआ था। जांच पड़ताल के बाद जब कोर्ट ने उसे दस्तखत करने के लिए कहा, तो उसने हस्ताक्षर की जगह अंगूठे का निशान लगा दिया। कोर्ट के पूछने पर पता चला कि विकास अपना नाम नहीं लिख सकता। कोर्ट को जब यह मालूम हुआ कि वह 5वीं क्लास में पढ़ता है, तो कोर्ट ने इस मामले को संज्ञान में लिया और उसके स्कूल खालीबगीचा गवर्नमेंट स्कूल को समन जारी कर पूछा कि जो लड़का अपना नाम तक नहीं लिख सकता,वह 5वीं क्लास में कैसे पहुंच गया। कोर्ट ने स्कूल की हेडमास्टर को अदालत के सामने पेश होने को कहा है और उनसे पूछा है कि आखिर यह सब कैसे हुआ।


ऐसी ख़बरें मैने कई बार मराठी अखबारों मे भी पढ़ी हैं। भारतीय शिक्षापद्धती किस प्रकार चल रही है, इस बात का एक और नमूना यही है। एक छात्र अगर पूरी तरह अनपढ़ रह के पांचवी कक्षा तक पहुंच सकता है तो इस का अर्थ है के चौथी तक के सभी बच्चें पूरी तरह अनपढ़ ही है। उड़िसा जैसे राज्य मे ऐसी परिस्थिती है तो बिहार और उत्तर प्रदेश में तो इस से बदतर स्थिती हो सकती है। हमारे यहां प्राथमिक शिक्षा बिल्कुल ठीक तरह से नहीं दी जाती यह बात सौ आना सच है। लेकिन इसे सुधारने के लिए हमारा शासन और प्रशासन भी कुछ कदम उठाता नज़र नही आता। जो कुछ भी इस दिशा मे होता है वह सब सिर्फ़ कागज पर ही दिखाई देता है। वास्तव मे इस का आऊटपूट शून्य है।

Friday, January 29, 2010

मैं और क्रिकेट

एक भारतीय होने के नाते मेरा भी यह फ़र्ज़ बनता है की, मै भी क्रिकेट को सबसे ज़्यादा प्यार करू. इसलिए हर भारतीय की तरह मै भी क्रिकेट का चहिता हूं. बचपन से ही हम क्रिकेट खेलते आये है. लेकिन १९९६ के विश्वकप के बाद मै टीवी पर भी क्रिकेट की मॅचेस देखने लगा. स्वदेश मे हुए इस विश्वकप मे भारत बूरी तरह से श्रीलंका से हार गया था और श्रीलंकाई टीम बहुत तेज़ी से उभर आई थी. विश्वकप के बाद भारतीय टीम मे बहुत से बदल किए गए. राहुल द्रविड और सौरव गांगुली इसी दौरान भारत के राष्ट्रीय टीम मे शामील हुए थे. सचिन तेंडुलकर तो पहले से ही टीम मे थे.
इन तीनों मे से मुझे सौरव गांगुली की बल्लेबाज़ी बहुत अच्छी लगती थी. ख़ास कर उस के ऑफ़साईड मे मारे हुए शॉट्स लाजवाब थे. सभी बल्लेबाजों मे मुझे सौरव गांगुली की ही बल्लेबाज़ी पसंद थी. मै ख़ुद एक दाहिने हाथ का बल्लेबाज़ था, लेकिन गांगुली की तरह बाए हाथ से बल्लेबाज़ी करने लगा. मै उस की नकल करने की कोशिश करता था. शुरूआत मे मुझे इस तरह बल्लेबाज़ी करना बहुत ही कठीन लगता था. लेकिन सोचता की, सौरव भी तो मूलत: दाहिने हाथ वाला है. अगर वो बाए हाथ से बल्लेबाज़ी कर सकता है तो मै क्यूं नहीं? धीरे धीरे मै बाए हाथ से बल्लेबाज़ी करने लगा. इसी दौरान मै गेंदबाज़ी की भी प्रॅक्टीस करता था. इसलिए साऊथ आफ़्रिका के एलन डोनाल्ड ने मुझे प्रभावित किया था. गेंदबाज़ी मे मै डोनाल्ड की नकल उतारता था. बाए हाथ से बल्लेबाज़ी करते रहने की वजह से मुझे दाहिने हाथ से बल्लेबाज़ी करनी बहुत ही आसान लगने लगा था. किसी चीज़ को अगर आप और कठिनाई मे जा कर सोचे तो पहले वाली चीज़ें आसान लगने लगती है. ठीक इसी तरह मेरे साथ भी हुआ. लेकिन मैने इस दौरान दाहिने हाथ से बल्लेबाज़ी के बारे मे सोचा नहीं.
क्रिकेट मे बल्लेबाज़ी से गेंदबाज़ी करना अधिक कठीन होता है. यह बात मुझे समझ मे आई थी. इसलिए बल्लेबाज़ी की बजाए मै गेंदबाज़ी की अधिक प्रॅक्टीस करता था. क्रिकेट मे समझो की गेंदबाज़ी मेरा पॅशन बन गया था. घर पर कोई नही होता तो, किसी दीवार को सामने रखकर वहां गेंदबाज़ी करता था. क्युंकी अकेला आदमी बल्लेबाज़ी की नही लेकिन गेंदबाज़ी की तो प्रॅक्टीस कर सकता है! ऑस्ट्रेलिया के ग्लेन मॅग्रा की गेंदबाज़ी ने मुझे प्रभावित किया था. साधारन गती से केवल लाईन और लेंथ के जोर पर आप कितनी अच्छी गेंदबाज़ी कर सकते है यह मैने मॅग्रा से सीखा. गांगुली रीटायर होने के बाद मैने बाए हाथ की बल्लेबाज़ी छोड दी. आज भी मै क्रिकेट मे गेंदबाज़ी को अपना पॅशन मानता हूं. कल बहुत दिन बाद मैने मैदान पर गेंदबाज़ी की थी. तब यह सब यादें ताज़ा हो गई.